अंतर्राष्ट्रीय व्यापार से नुक़सान क्या क्या हो सकते हैं? क्या अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पूरी तरह सुरक्षित है?
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का अर्थ है विभिन्न देशों के बीच वस्तुओं और सेवाओं का क्रय विक्रय यानि कि आयात एवं निर्यात करना। आज के दौर में विश्व अर्थव्यवस्था की दृष्टि से अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का महत्व प्रशंसनीय है।अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के माध्यम से विश्व के अनेक देश अपने आर्थिक विकास को बढ़ावा देते हैं। अंतर्राष्ट्रीय व्यापार से केवल लाभ ही प्राप्त नहीं होते, बल्कि कुछ नुक़सान होने की भी आशंका होती है। आइए इस अंक में हम जानेंगे कि अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के नुक़सान (antarrashtriya vyapar ke nuksan) क्या हैं?
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार से होने वाले नुक़सान (Antarrashtriya Vyapar se hone wale nuksan)
1. विदेशों पर निर्भरता -
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के कारण विभिन्न देश एक दूसरे पर निर्भर हो जाते हैं क्योंकि वे कुछ वस्तुओं का उत्पादन स्वयं करते हैं लेकिन कुछ के आयात के लिए विदेशों पर निर्भर रहने लगते हैं। किसी कारण जैसे- युद्ध, प्राकृतिक आपदा, राजनैतिक तनाव अथवा आर्थिक संकट उत्पन्न होने पर विदेशी व्यापार के अवरुद्ध होने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। इससे देश की अर्थव्यवस्था और जनता दोनों प्रभावित होते हैं।
जब देश की अर्थव्यवस्था असंतुलित हो जाती है और वहां भयावह मंदी अपना पैर पसारने लगती है तो इसका दुष्प्रभाव दूसरे देशों की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है जिनसे उनके आपसी व्यापारिक संबंध होते हैं। आपको यह तो पता होगा कि सन् 1929 में आर्थिक संकट के दौरान मंदी के भयंकर हालात, विश्व के लगभग सभी देशों में उत्पन्न हो चुके थे। विश्वव्यापी महामंदी अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का ही परिणाम थी।
2. घरेलू उद्योगों को नुक़सान -
स्वतंत्र विदेशी व्यापार देश के घरेलू उद्योगों के लिए बहुत हानिकारक होता है। अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के चलते कभी कभी घरेलू उद्योगों को अत्यंत कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है। विदेशी व्यापार के कारण
विदेशी वस्तुएं अपेक्षाकृत कम क़ीमतों पर बाज़ार में उपलब्ध होती हैं, जिस कारण स्थानीय उlद्योगों की वस्तुएं बिकना कम हो जाती हैं। इसका विपरीत प्रभाव
घरेलू उद्योगों पर पड़ता है।
परिणामस्वरूप श्रम तथा पूंजी दोनों बेक़ार हो जाते हैं। छोटे और मध्यम घरेलू उद्योग पूरी तरह नष्ट हो जाते हैं। इससे देश की अर्थव्यवस्था चरमरा जाती है। इससे विकसित देशों को तो लाभ होता है लेकिन पिछड़े देश और अधिक पिछड़ जाते हैं। भारत के लघु एवं कुटीर उद्योगों का पतन इंग्लैंड के मशीनों द्वारा निर्मित माल के आयात के कारण ही हुआ था।
3. राशिपातन -
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के माध्यम से कभी-कभी विकसित देशों द्वारा पिछड़े हुए देशों में वस्तुओं का राशिपातन किया जाता है। राशिपातन से तात्पर्य होता है, अपने देश की वस्तु को दूसरे देश में कम मूल्य पर बेचना। अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में अनेक राष्ट्र अपनी वस्तु को दूसरे देशों में कम से कम मूल्य पर सिर्फ़ इसलिए बेचते हैं ताकि वे उस देश के बाज़ारों पर अपना कब्ज़ा कर सकें।
सचमुच इस नीति से आयातकर्ता देशों के उद्योगों का पतन होता है। साथ ही इससे एकाधिकार की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलता है और जनता का शोषण होता है। स्पष्ट तौर पर राशिपातन से देशी उद्योगों पर बड़ा ही घातक प्रभाव पड़ता है जिस कारण शीघ्र ही वे ठप्प हो जाते हैं। धीरे धीरे जब देशी उद्योग धंधे समाप्त हो जाते हैं तो विदेशी उद्योगपतियों द्वारा पुनः अपनी उन वस्तुओं का मूल्य बढ़ा दिया जाता है।
4. विलासिता व हानिकारक वस्तुओं का आयात अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के कारण कभी-कभी विलासिता व हानिकारक वस्तुओं के आयात को प्रोत्साहन मिलता है जिससे देशवासियों के स्वास्थ्य एवं चरित्र पर बुरा प्रभाव पड़ने लगता है।
5. देश का एकांगी विकास -
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के कारण उत्पादन के विशिष्टीकरण का जन्म होता है। अंतर्राष्ट्रीय व्यापार, भौगोलिक श्रम विभाजन अथवा विशेषज्ञता के आधार पर किया जाता है, अर्थात प्रत्येक देश केवल उन्हीं वस्तुओं का उत्पादन करता है जिनमें उसे तुलनात्मक लाभ प्राप्त होता है।सीधे शब्दों में कहें तो, देश में केवल उन्हीं उद्योगों का विकास किया जाता है जिनमें उत्पादित वस्तुओं की मांग विदेशों में की जाती है। परिणाम यह होता है कि देश में अन्य साधन बेकार पड़े रहते हैं और रोज़गार के स्तर में भारी कमी आ जाती है। जिस कारण देश का आर्थिक ढांचा असंतुलित हो जाता है।
6. विदेशी प्रतियोगिता से हानि -
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के कारण देशी उद्योग के लिए विदेशी प्रतियोगिता का ख़तरा उत्पन्न हो जाता है। कभी-कभी विदेशी प्रतियोगिता के कारण देशी उद्योगों को बहुत ज़्यादा हानि होती है। क्योंकि विदेशी व्यापार के कारण देश की औद्योगिक इकाइयों को विदेशी उद्योगों से सीधे प्रतियोगिता करनी पड़ती है।
जब देशी उद्योग विदेशी प्रतियोगिता के सामने टिक नहीं पाते हैं तो उनका ह्रास होने लगता है क्योंकि विकसित देशों में उत्पादित वस्तुएं उन्नत तकनीक के कारण अधिक सस्ती एवं टिकाऊ होती हैं। विदेशी प्रतियोगिता के कारण ही उन्नीसवीं शताब्दी में भारत के लघु उद्योगों का पतन हुआ था तथा कृषि पर जनसंख्या का भार बढ़ जाने के कारण अर्थव्यवस्था में भयानक असंतुलन की स्थिति उत्पन्न हो गयी थी।
7. कृषि प्रधान राष्ट्रों को हानि -
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का लाभ केवल औद्योगिक दृष्टि से विकसित लोगों को ही प्राप्त होता है। कृषि प्रधान देशों को प्रायः हानि होती है। इसका प्रमुख कारण प्राथमिक (कृषि) क्षेत्र में उत्पत्ति ह्रास नियम का लागू होना होता है। कृषि प्रधान देश कृषिगत वस्तुओं का निर्यात करते हैं। इन क्षेत्रों में उत्पत्ति हास नियम लागू होने के कारण उत्पादन व्यय बढ़ जाते हैं। इसके विपरीत ये देश ऐसी वस्तुओं का आयात करते हैं जिन पर औद्योगीकरण के साथ-साथ उत्पत्ति वृद्धि नियम लागू होते हैं।
8. असमान विकास -
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का लाभ सभी देशों को समान रूप से नहीं मिलता। विकसित देश अपनी तकनीक और पूंजी के बल पर अधिक लाभ प्राप्त करते हैं, जबकि विकासशील देश पीछे रह जाते हैं। इससे वैश्विक स्तर पर विभिन्न देशों के बीच आर्थिक असमानताएं बढ़ सकती हैं।
9. अंतर्राष्ट्रीय वैमनस्यता -
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में बढ़ती हुई प्रतियोगिता के कारण प्रत्येक देश यही चाहता है कि वह बढ़ चढ़कर अपने निर्यातों में वृद्धि करे। इसके लिए वह नित नए-नए बाज़ारों की खोज में लगा रहता है। ताकि वह उन नए नए बाज़ारों को हथियाकर अपना आधिपत्य स्थापित कर सके। विदेशी बाज़ारों पर अपना कब्ज़ा जमाने की यह होड़ यानि कि अत्यधिक प्रतिस्पर्धा, अंतर्राष्ट्रीय वैमनस्यता के वातावरण को जन्म देती है। बाज़ारों को प्राप्त करने के साथ-साथ कच्चे माल को प्राप्त करने के लिए भी प्रतियोगिता होती है जिससे युद्धों का जन्म होता है और उपनिवेशवाद को प्रोत्साहन मिलता है।
10. बेरोज़गारी की समस्या -
जब देश में विदेशी वस्तुएं सस्ती और बेहतर गुणवत्ता वाली प्राप्त होने लगती है तब देश के लोग उन वस्तुओं को ख़रीदने में अपेक्षाकृत अधिक रुचि लेते हैं। इसके कारण स्थानीय कारखानों का उत्पादन घट जाता है। परिणामस्वरूप कई श्रमिकों की नौकरियां चली जाती हैं और बेरोज़गारी बढ़ने लगती है। यह स्थिति विशेष रूप से विकासशील देशों में अधिक देखने मिलती है।
11. जीवन स्तर का ह्रास -
कभी-कभी विदेशी व्यापार के लाभ को प्राप्त करने के लिए व्यापारी वर्ग स्वदेशी माल का आवश्यकता से अधिक निर्यात कर देते हैं, जिससे देश में उपभोग की वस्तुओं में कमी हो जाती है तथा वस्तुओं की कीमतें बढ़ जाती हैं। कभी-कभी देश में अन्य देशों से पर्याप्त मात्रा में आयात के न होने के कारण भी ऐसी स्थिति उत्पन्न होती है जिसका देशवासियों के जीवन स्तर पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
12. सांस्कृतिक प्रभाव -
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के कारण विदेशी वस्तुओं के साथ-साथ विदेशी जीवन-शैली का प्रभाव पड़ने लगता है। देश विदेश के साथ विस्तृत व्यापार के चलते, लोग विदेशी उत्पादों और संस्कृति को अपनाने लगते हैं, जिससे स्थानीय संस्कृति, परंपराएं फीकी पड़ने लगती हैं और घरेलू बाज़ारों में स्वदेशी वस्तुओं का महत्व धीरे धीरे कम होता चला जाता है।
13. प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन -
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के चलते कभी कभी ज़्यादा मांग होने के कारण, कुछ देश अपने कच्चे माल तथा बहुमूल्य खनिजों का निर्यात, अन्य देशों को ज़रूरत से ज़्यादा कर देते हैं। या कुछ देश विदेशी बाज़ारों में वस्तुओं की मांग बढ़ने के कारण अत्यधिक मात्रा में उत्पादन करने लगते हैं जिस कारण उनके प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन होता है। इससे देश के दीर्घकालिक औद्योगिक विकास पर बुरा प्रभाव पड़ता है। साथ ही पर्यावरण पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। यदि इन्हें बचाकर रखा जाए तो भविष्य में आर्थिक लाभ कमाने के लिए इन्हें प्रयुक्त किया जा सकता है। भारत से भी कुछ खनिज जैसे- मैगनीज, अभ्रक, लोहा आदि का निर्यात निरंतर किया जा रहा है।
14. राजनीतिक एवं आर्थिक शोषण -
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के कारण संपूर्ण विश्व दो भागों में बंट गया है। एक ओर अल्पविकसित देश हैं तो दूसरी तरफ़ विकसित देश। जहां आर्थिक दृष्टि से कमज़ोर होने के नाते अल्पविकसित देशों को ही प्रतिकूल व्यापार शतों पर व्यापार करना पड़ता है अर्थात विकसित देशों द्वारा अल्पविकसित देशों का शोषण किया जाता है। सीधे शब्दों में कहा जाए तो विश्व के शक्तिशाली देश कमज़ोर देशों पर राजनीतिक या आर्थिक दबाव बनाए रखते हैं। इन्हीं व्यापार समझौतों के कारण कमज़ोर देशों को अपनी नीतियों में बदलाव करना पड़ता है, जिससे उनकी स्वतंत्रता प्रभावित होती है। जिस कारण छोटे देश अंतर्राष्ट्रीय व्यापार से पूरी तरह लाभान्वित नहीं हो पाते हैं।
निष्कर्ष (Conclusion)
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार आज आधुनिक अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण अंग बन चुका है। लेकिन इसका एक दूसरा पक्ष यह भी है कि इसके कुछ नकारात्मक प्रभाव भी हैं। आपने इस अंक के माध्यम से जाना कि अंतर्राष्ट्रीय व्यापार से क्या-क्या नुक़सान हो सकते हैं? इससे घरेलू उद्योगों को नुक़सान, बेरोज़गारी, विदेशी निर्भरता और आर्थिक असंतुलन जैसी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। इसलिए आवश्यक है कि प्रत्येक देश संतुलित और सावधानीपूर्वक व्यापार नीतियां अपनाने का निर्तंतर प्रयास करे ताकि अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के लाभ प्राप्त किए जा सकें और इस बात का प्रयास किया जा सके कि अंतर्राष्ट्रीय व्यापार की हानियां कम से कम हों।
Some more topics :
