गुरु तेग बहादुर जी का जीवन परिचय | Guru Tegh bahadur history in hindi

विश्व इतिहास में धर्म, मानवीय मूल्यों, आदर्शों एवं सिद्धांतों की रक्षा के लिए प्राणों की आहुति देने वालों में गुरु तेग बहादुर साहब का स्थान अद्वितीय है। सचमुच यदि सम्पूर्ण दुनिया में सच्चे गुरु के जीवन की गाथा पढ़ी जाएगी तो गुरु तेग बहादुर जी की गाथा सबसे ऊपर रखी जायेगी।

Guru tegh bahadur in hindi


इस दुनिया में धर्म गुरु तो अनेक हुए हैं। लेकिन तेग बहादुर जी की तुलना न तो किसी से हुई है और न कभी हो सकती है। आज हम इस लेख में महान धर्मगुरु Guru Tegh bahadur biography in hindi पढ़ रहे हैं। हमारे साथ लेख के अंत तक बने रहिये। हमें यक़ीन है तेग बहादुरजी की यह जीवन गाथा, आपके अंतर्मन को पूरी तरह झिंझोड़ कर रख देगी। आपको भाव-विभोर कर देगी।


तेग बहादुर जी का जन्म और परिवार

सतगुरु तेग बहादुर जो कि सिख धर्म के नौवें धर्म गुरु थे। इनका जन्म बैसाख पंचमी संवत 1678 ( 21 अप्रैल सन 1621) को अमृतसर में गुरु हरगोविंद साहिब के घर हुआ। ये सिख सम्प्रदाय के छठे गुरु हरगोबिंद साहिब के सबसे छोटे पुत्र थे। ये बचपन से ही पराक्रमी थे। इनके इसी पराक्रम को देखकर श्री हरगोविंद साहिब ने अपने इस पुत्र का नाम तेग बहादुर रख दिया था।

बाल्यावस्था से ही वे संत स्वरूप, गहन विचारवान, उदार चित्त, बहादुर व निर्भीक स्वभाव के थे। संत गुरु श्री तेग बहादुरजी को बचपन से ही गुरुवाणी, वेदशास्त्र व उपनिषदों से बेहद लगाव था। आध्यात्म के साथ-साथ ये विभिन्न शास्त्र विद्याओं में भी पारंगत थे। प्रतिवर्ष 9 अप्रैल को गुरु तेग बहादुर जी का जन्मोत्सव मनाया जाता है।


कैसे हुआ धर्म का प्रचार-प्रसार?

उनके जीवन का प्रथम दर्शन यही था। उनका मानना भी यही था कि "धर्म का मार्ग सत्य और विजय का मार्ग है।" इन्होंने लोगों को प्रेम, एकता व भाईचारे का संदेश दिया। वैसे भी तेग बहादुरजी शांति, क्षमा, सहनशीलता जैसे गुणों के धनी थे।
सत्य ज्ञान के प्रचार-प्रसार एवं लोक कल्याणकारी कार्य के लिए गुरु तेग बहादुर जी ने कई स्थानों का लगातार भ्रमण किया। अनंतपुर से कीरतपुर, रोपड, सैफाबाद के लोगों को संयम तथा सहजता के मार्ग का ज्ञान दिया।
गुरुजी की यात्रा यहीं नहीं रुकी बल्कि धर्म के सत्य मार्ग पर चलने का उपदेश देते हुए वे दमदमा से होते हुए कुरुक्षेत्र भी पहुँचे। कुरुक्षेत्र से यमुना किनारे होते हुए कड़ामानकपुर जाकर उन्होंने साधु भाई मलूकदास का भी उद्धार किया।
यहाँ से गुरु श्री तेग बहादुर जी प्रयाग, बनारस, असम, पटना आदि क्षेत्रों में गए। वहाँ उन्होंने लोगों के आध्यात्मिक, सामाजिक, आर्थिक उन्नयन के लिए अनेक रचनात्मक कार्य किये। आध्यात्मिक स्तर पर असंख्य लोगों में धर्म का सच्चा ज्ञान बाँटा। 
सामाजिक स्तर पर चली आ रही रूढ़ियों, अंधविश्वासों की कटु आलोचना करते हुए उन्होंने नए सहज जनकल्याणकारी आदर्श स्थापित करने का प्रयास किया। उन्होंने प्राणी सेवा एवं परोपकार के लिए कुँए, बावलियाँ आदि खुदवाए और अनेक धर्मशालाओं का निर्माण भी कराया। उन्होंने देश की धार्मिक स्वतंत्रता के लिए कई कुर्बानियां दीं लेकिन कभी समझौता नहीं किया। वे अपने निश्चय पर हमेशा ही अडिग रहे।

उन्होंने मुगलों के नापाक इरादों को नेस्तनाबूत किया और  क़ुर्बान हो गए। गुरु तेग बहादुर सिंहजी द्वारा रचित वाणी के 15 रागों में 116 शब्द श्री गुरुग्रंथ साहिब में संकलित हैं।गुरु तेग बहादुरजी ने धर्म की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया और इसी कारण वे सही अर्थों में हिंदी की चादर कहलाये। वे धार्मिक स्वतंत्रता चाहते थे। यानि कि वे किसी पर ज़बरदस्ती धर्म परिवर्तन करने का दबाव डालना अनैतिक कार्य मानते थे। 

इन्होंने कश्मीरी पंडितों और अन्य हिंदुओं को बलपूर्वक मुस्लिम बनाने का विरोध किया। परिणामस्वरूप औरंगजेब ने गुरुजी को गिरफ़्तार कर लिया। आइये जानते हैं गुरु तेग बहादुर जी के बलिदान की कहानी जो कि बड़ी ही मर्मस्पर्शी है।


क्या थी गुरुजी के बलिदान की कहानी?

गुरुजी के बलिदान की बात करें तो तेग बहादुरजी की शहादत के कारण सिखों की पहचान और उनके मानवाधिकारों की सुरक्षा करने में बड़ी मदद मिली। दरअसल गुरु तेग बहादुर ने गद्दी में बैठते ही सिखों का संगठन शुरू किया। साथ अनंतपुर नाम का स्थान बसाया।

सन 1664 में सिख समुदाय के 8वें गुरु श्री हरिकृष्ण जी साहिब की अकाल मृत्यु के बाद तेग बहादुर जी को सिख समुदाय के 9वें गुरु के रूप में गुरु गद्दी सौंप दी गयी। गुरु तेग बहादुर साहिब, संत गुरु गुरुनानक जी द्वारा बताए मार्ग पर चलते हुए विभिन्न स्थलों की यात्रा कर ग़रीबों के कष्ट दूर करने लगे। जिस कारण धीरे-धीरे हज़ारों लोग इनसे जुड़ने लगे। इस तरह गुुरु तेग बहादुर सिख धर्म की दीक्षा लेने लगे। इस प्रकार समूचे उत्तरभारत में गुरु श्री तेग बहादुर जी का वर्चस्व बढ़ने लगा। चहुँओर सिख धर्म का नाम यानि कि सिख धर्म का वर्चस्व बढ़ने लगा।

उन्हीं दिनों दिल्ली की मुगल सत्ता, शाहजहाँ के हाथों से निकलकर, अत्यंत निर्दयी व क्रूर औरंगज़ेब के हाथों में जा चुकी थी। वह अपने 3 भाई और 2 भतीजों की हत्या कर गद्दी हासिल कर चुका था। वह अपने राज में चारों तरफ़ अत्याचार करने लगा था।

औरंगज़ेब ने कश्मीरी हिंदुओं पर भी अत्याचार करना शुरू कर दिया था। माताओं-बहनों पर ज़ुल्म होने लगे। ऐसी विकट परिस्थितियों में सम्पूर्ण भारत के हिन्दू पंडितों के लिए श्री तेग बहादुर जी साहब के अलावा कोई और सहारा नहीं रह गया था।

सन 1675 में गुरु तेग बहादुरजी से मिलने, पंडित कृपाराम के नेतृत्व में कश्मीरी पंडितों और पीड़ितों का एक जत्था अनंतपुर साहिब मिलने आया। रोते बिलखते, अत्याचार सहते, मदद की गुहार लगा रहे हिंदुओं की व्यथा सुनकर तेग बहादुर जी अधीर हो उठे। 

इसी बीच तेग बहादुरजी के 8 साल के बेटे गोविंद सिंह वहाँ आ गए। उन्होंने अपने पिता से पूछा कि क्या इस समस्या का अब कोई समाधान नहीं हो सकता? तेग बहादुर जी ने कहा कि इस अत्याचार से छुटकारा पाने के लिए किसी न किसी महापुरुष को तो कुर्बानी देनी ही होगी।

तभी उनके पुत्र ने फौरन कहा कि 'आप से बढ़कर कोई महापुरुष हो सकता है भला।' बच्चे के इस तेजस्वी जवाब से तेग बहादुर जी गदगद हो गए। और पंडितों से कह दिया कि जाओ उस निर्दयी से कह दो कि पहले वो हमसे धर्म परिवर्तन की बात करें। फ़िर दूसरों पर अत्याचार करे।

इस संदेश से भड़ककर औरंगज़ेब ने तेग बहादुर जी को दिल्ली आने का हुक्म दे दिया। समय की नज़ाकत को देखते हुए तेग बहादुर अपने पुत्र को अपनी गुरु गद्दी सौंपकर दिल्ली के लिए निकल पड़े। लेकिन निकलते समय उनके साथ उनके भाई मतिदास, दयालदास, सतीदास और भाई जयता भी शहादत का चोला पहने निर्भयता के साथ अन्तपुर साहिब से निकल पड़े। वहीं रास्ते में दीन दुःखियों की मदद करते हुए कुँए, बावड़ियों का निर्माण कराना जारी रखा।

गुरु औरंगज़ेब को अपनी ओर आता देख, साथ ही समस्त भारत की जनता का प्यार पाता देख औरंगज़ेब गुस्से से भौखला गया। उसमें फ़ौरन तेग बहादुर और उनकी टीम को बंदी बनाकर दिल्ली लाने का हुक्म दे दिया। 

इस तरह आगरा से बंदी बनाकर उन्हें दिल्ली लाया गया। जहाँ तीन दिनों तक उन्हें व उनके शिष्यों को पानी तक नहीं दिया गया। दिल्ली की कोतवाली के पास गुरुजी व उनके शिष्य लाये गए। यहाँ लाकर उन्हें धमकी दी गयी कि अगर उन्होंने धर्म परिवर्तन नहीं किया तो उनको उनके सभी साथियों के साथ कत्ल कर दिया जाएगा। लेकिन गुरु तेग बहादुर जी के चेहरे पर डर की कोई शिकन तक नहीं थी।

ऐसे में औरंगज़ेब की बौखलाहट बढ़ती चली गयी। उसने एक-एक कर गुरु तेग बहादुर जी के साथियों की हत्या करना शुरू कर दिया। धर्म परिवर्तन के लिए राज़ी करने के लिए उनके ही सामने उनके भाई मतिदास को आरी से काटकर मार डाला गया। उसके बाद दयालदास को भी खौलते पानी में डालकर मार डाला। उसने भी हँसते-हँसते शहादत क़ुबूल की लेकिन वे अपनी बात पर अडिग रहे।

गुरु तेग बहादुर जी औरंगज़ेब के सामने नहीं झुके और अपने शिष्यों के अद्भुत बलिदान का गुणगान करते रहे। इसके बाद भाई सतीदास को भी रुई से लपेटकर उनके ही सामने जला दिया गया। लेकिन गुरुजी फ़िर भी अपनी बात पर अडिग रहे।  
इस तरह गुरु तेग बहादुर के सभी भाइयों ने मुस्कुराते हुए मौत को गले लगा लिया। लेकिन अपना धर्म नहीं बदला। अंतिम सांस तक बस यही कहते रहे कि 'भले जान चली जाये पर अपना सिख धर्म कभी न जाये।'

अंत में औरंगज़ेब ने गुरु तेग बहादुर जी को भी कलमा पढ़ अपना धर्म परिवर्तन करने पर ज़ोर डालना शुरू किया। श्री तेग बहादुर जी ने बड़े ही विनम्र भाव से कहा कि "धर्म त्याग करने से ज़्यादा बेहतर यही होगा कि मैं शहादत स्वीकार कर लूँ।" गुरु तेग बहादुरजी के इस अटल जवाब को सुन औरंगज़ेब गुस्से से आगबबूला हो गया। और उनका सिर कलम करने का हुक्म जारी कर दिया। 

इस तरह इस्लाम स्वीकार नहीं करने के कारण, मुगल शासक औरंगज़ेब ने सन 1675 में, चाँदनी चौक में सबके सामने, सुबह-सुबह गुरुजी के सिर को धड़ से अलग करवा दिया। जो कि औरंगज़ेब की बौखलाहट और उसकी हार का नतीजा था। क्योंकि वह जीते जी इनमें से किसी का भी धर्म परिवर्तन नहीं करा सका। उसका घमंड चूर-चूर हो चुका था।

इस तरह सिख धर्म के 9वें धर्म गुरु ने सिख धर्म को बचाने के लिए ख़ुशी-ख़ुशी अपनी शहादत क़ुबूल कर लिया। उनके कटे सिर को उनके भक्तों व अनुयायियों ने वापस अनंतपुर साहिब लाया। फिर गुरुजी के धड़ को अपने घर में रखकर अपने घर में आग लगा दी। इस तरह उन्होंने अपने गुरु का अंतिम संस्कार किया।


गुरुजी के बलिदान का क्या प्रभाव पड़ा

शिष्यों के बलिदान के बाद गुरु तेग बहादुर ने अपना शीश बलिदान कर दिया। दिल्ली में शशिगंज गुरुद्वारा गुरु तेग बहादुर के उस महान बलिदान की स्मृति को आज भी ताज़ा कर देता है। दरअसल गुरु तेग बहादुर के इस महान बलिदान के कारण मुस्लिम शासन व उत्पीड़न के ख़िलाफ़ सिखों का संकल्प और भी ज़्यादा मज़बूत हो गया।

ऐसा माना जाता है कि नौवें गुरु को बलपूर्वक धर्मान्तरित करने के प्रयास के कारण स्पष्ट रूप से इस शहीद के नौ वर्षीय बेटे, गोबिन्द पर एक अमिट छाप पड़ चुकी थी। परिणाम स्वरूप जिन्होंने धीरे-धीरे उसके विरुद्ध सिख समूहों को इकट्ठा करके इसका प्रतिकार किया। इसने ख़ालसा पहचान को जन्म दिया। 


निष्कर्ष (Conclusion)
गुरुद्वारा शीशगंज साहिब तथा गुरुद्वारा रकाब गंज साहिब इस बात का स्मरण सदैव दिलाते रहते हैं कि गुरुजी की किस तरह हत्या की गई। गुरु तेग बहादुर के इस बलिदान ने शहंशाहे हिन्द के गुरूर को नेस्तनाबूत कर दिया। सिख के इस बहादुर गुरु ने हिन्द की चादर बनकर, एक अधर्मी शासक को सबके सामने लाचार कर दिया। उसे दिखा दिया कि धर्म की ताक़त क्या होती है। ऐसे गुरु श्री तेग बहादुर जी के बलिदान को भारत कभी भूल नहीं पायेगा। ये भारत भूमि ऐसे ही कर्मठ और अटल समाज सेवी महापुरुषों के नाम से जानी जाती है और सदैव जानी जाती रहेगी।

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