बच्चों की एक्टिविटी पर तनाव कैसा? बच्चों की एक्टिविटी पर तनाव न लें, हर बच्चे की आदतें अलग अलग होती हैं।
दोस्तों जिस तरह हर इंसान का चेहरा अलग-अलग होता है। उसी तरह हर बच्चा अपनी सोच, स्वभाव और आदतों में अलग होता है। हर बच्चे की पसंद नापसंद, उसका व्यवहार, सोचने का तरीक़ा अलग अलग होता है।
कोई बच्चा बहुत बोलने वाला होता है, तो कोई चुप रहने वाला। कोई बच्चा बहुत मिलनसार होता है, तो कोई बच्चा अंतर्मुखी हो सकता है। कोई बच्चा पढ़ाई में तेज़ होता है, तो कोई बच्चा कोई खेल-कूद में निपुण होता है। कोई बच्चा सुबह जल्दी उठता है, तो कोई देर तक सोता है। किसी को चित्रकला पसंद है, तो किसी को गणित।
साधारण तौर पर देखा जाए तो बच्चों में पाया जाने वाला ये अंतर, प्रकृति की सुंदर विविधता है न कि किसी प्रकार की कमी। लेकिन अक़्सर माता-पिता अपने बच्चों की इन भिन्नताओं को “समस्या” समझ लेते हैं। जिस कारण माता-पिता, अपने बच्चे की आदतों को लेकर तनाव, झुंझलाहट और अनचाही तुलना करना शुरू कर देते हैं।
हम आपको बता दें कि बच्चों की ये आदतें समस्या नहीं, बल्कि एक नार्मल संकेत मात्र हैं। बच्चे की हर आदत उसके अंदर के मनोभावों का संकेत होती है। बच्चों की हर शरारत में जिज्ञासा छिपी होती है। हर ग़लती में सीखने का मौक़ा दिखाई देता है। उनके हर सवाल में एक नया दृष्टिकोण होता है।
अगर कोई बच्चा चुप रहता है, तो इसमें चिंता कैसी? हो सकता है वह बच्चा संवेदनशील या सोचने वाला स्वभाव रखता हो। अगर कोई बच्चा ज़िद्दी है, तो वह आत्मविश्वासी और स्पष्टवादी भी हो सकता है। अगर आपका बच्चा बार-बार सवाल पूछता है, तो वह जिज्ञासु और सीखने की प्रवृत्ति वाला भी हो सकता है। यानि कि अगर हम बच्चों की इन आदतों को नकारात्मकता के बजाय सकारात्मक दृष्टि से देखें, तो हमारा तनाव काफ़ी हद तक कम हो सकता है।
माता-पिता क्यों तनाव में आते हैं? (Why do parents get stressed?)
माता-पिता का रिश्ता बच्चों से केवल ज़िम्मेदारी का नहीं, बल्कि गहरे प्रेम, लगाव और भविष्य की चिंता से जुड़ा होता है। ज़्यादातर माता पिता के तनाव में आने के कारण निम्न होते हैं -
1. निस्वार्थ प्रेम और अपनापन -
माता पिता का अपने बच्चों के साथ निस्वार्थ प्रेम होता है। माता पिता की प्रबल इसका होती है कि उनके बच्चे स्वस्थ, सुखी, सुरक्षित एवं सफल रहें। उनका यही अनंत प्रेम उनके लिए तनाव और चिंता का कारण बन जाता है।
2. भविष्य की चिंता :
माता-पिता के मन में बच्चों की पढ़ाई, उनका कैरियर, नौकरी, शादी और सामाजिक प्रतिष्ठा को लेकर अक़्सर चिंता बनी रहती है। इन सभी बातों को लेकर माता-पिता अक़्सर बहुत पहले से ही सोचना शुरू कर देते हैं। "हमारे बाद हमारे बच्चों का क्या होगा?" “कल क्या होगा?” यही सोच उनके तनाव का बड़ा कारण बनती है।
3. ज़िम्मेदारी का भाव -
बच्चों से होने वाली हर ग़लती, उनकी असफलता और जीवन में होने वाली परेशानियों का ज़िम्मेदार माता-पिता अक़्सर ख़ुद को मानने लगते हैं। अगर उनका बच्चा कहीं भटक जाए या जीवन के संघर्ष में कहीं असफल हो जाए तो उन्हें हमेशा यही लगता है कि अगर कहीं न कहीं उनकी परवरिश में कमी रह गई।
4. समाज और तुलना का दबाव -
समाज में अक़्सर बच्चों की तुलना दूसरों से की जाती है जैसे कि नंबर, नौकरी, कमाई, व्यवहार आदि। यही तुलना माता-पिता के मन में डर पैदा कर देती है कि कहीं उनका बच्चा समाज की सोच से कहीं पीछे न रह जाए। पड़ोसी, रिश्तेदार या स्कूल की अपेक्षाएँ इतनी ज़्यादा होती हैं कि माता-पिता आवश्यकता से ज़्यादा सोचने पर मजबूर हो जाते हैं। उनके दिमाग़ में हरदम बस एक यही सोच घर कर जाती है कि उनका बच्चा “नॉर्मल” या फ़िर “आदर्श” ही होना चाहिए।
5. दूसरों से तुलना की प्रवृत्ति -
ज़्यादातर माता पिता यही कहते देखे जाते हैं कि “देखो पड़ोसी का बेटा कितना समझदार है, और इसे देखो पूरा दिन बस मोबाइल ही मोबाइल..!" इस तरह की चिंता से माता-पिता ख़ुद तो तनाव में रहते हैं और बच्चे पर बात-बात पर दबाव बनाते रहते हैं।
6. अपेक्षाओं का बोझ -
हर माता-पिता एक यही अपेक्षा रखते हैं कि उनका बच्चा सर्वश्रेष्ठ हो। लेकिन यदि वह नार्मल दिखाई दे तो उसे “समस्या” समझ लिया जाता है। ऐसे में अपनी अपेक्षाओं के टूटने का डर, अपने बच्चों से बुरे बर्ताव का कारण बनने लगता है। कई माता-पिता अपने अधूरे सपनों को अपने बच्चों के ज़रिए पूरा करना चाहते हैं। लेकिन जब बच्चे उनकी उम्मीदों पर खरे नहीं उतरते, तब उनका तनाव और बढ़ जाता है।
7. सुरक्षा की चिंता -
आज के समय में ऐसी अनेक आदतें हैं जैसे- नशा, ग़लत संगत, इंटरनेट का दुरुपयोग, अपराध। इन सब बातों से माता-पिता ज़रूरत से ज़्यादा डरे रहते हैं। वे हर वक़्त बच्चों की सुरक्षा को लेकर चिंतित रहते हैं। चूंकि माता-पिता जीवन के उतार-चढ़ाव देख चुके होते हैं। वे अच्छी तरह जान चुके होते हैं कि दुनिया आसान नहीं है, इसलिए वे अपने बच्चों को उन कठिनाइयों से बचाना चाहते हैं।
8. अपनी तरह बनाने की होड़ -
अक़्सर माता पिता अपने बच्चों को अपनी तरह ही बनाना चाहते हैं। ज़रा आप ही सोचिए, यदि माता-पिता शांत स्वभाव के हैं, तो यह ज़रूरी तो नहीं, कि बच्चा भी वैसा ही हो। अगर कोई पेरेंट्स खेलकूद पसंद नहीं करते हैं, तो इसका मतलब यह नहीं कि उसका बच्चा भी खेलों से दूर रहेगा। बच्चों पर माता-पिता का प्रभाव ज़रूर होता है, पर यह उसके व्यक्तित्व की दिशा तय करता है, स्वरूप नहीं। हर बच्चा अपनी सोच, अपनी रुचि और अपने अनुभवों से ही कुछ बनता है।
माता-पिता क्या करें? (What should parents do?)
बच्चों में देखी जाने वाली अलग-अलग आदतों से परेशान होने के बजाय माता पिता नीचे दिए गए निम्न तरीक़े अपना सकते हैं -
1. उनकी आदतों को स्वीकार करें -
सामान्यतः हर बच्चा अलग होता है जैसे कोई बच्चा गणित में अच्छा होता है तो कोई संगीत में। कोई बच्चा पढ़ने में अच्छा होता है तो कोई खेल के क्षेत्र में अव्वल होता है। हर क्षेत्र की अपनी अहमियत होती है। इसलिए बच्चे को उसी दिशा में और भी बेहतर मार्गदर्शन देने की कोशिश कर सकते हैं।
2. दूसरों से तुलना न करें -
माता पिता द्वारा की गई तुलना, बच्चे के आत्मविश्वास को तोड़ देती है, उसके मन-मस्तिष्क में नकारात्मकता पैदा करती है। जिस कारण घर में तनाव बढ़ता जाता है। माता-पिता को कोशिश करनी चाहिए कि वे बच्चों की तुलना किसी से न करें। इससे अच्छा वे उन्हें प्यार से समझा सकते हैं जब उसका मूड अच्छा हो।
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3. बेहतर संवाद करने की कोशिश करें -
बच्चे के मन में क्या चल रहा है यह जानने की कोशिश प्यार से करना चाहिए। क्योंकि उसे अपने सवालों में उलझाने से बेहतर है उसकी भावनाओं को समझते हुए उससे उसके मन में क्या चल रहा है जानने का प्रयास किया जाए। हो सकता है ऐसा करने से आपका बच्चा बड़ी ही मासूमियत के साथ अपने मन की बात आपसे साझा करना शुरू कर दे।
4. सकारात्मक उदाहरण दें
बच्चे सुनने से ज़्यादा देखने से सीखते हैं। अगर माता-पिता शांत और धैर्यवान रहेंगे, तो बच्चा भी वैसा ही बनेगा। बच्चे को कोई बात समझाते समय उसके साथ सख़्ती से पेश न आएं बल्कि उसे शांति से समझाने का प्रयास करें।
5. अपेक्षाएँ सीमित रखें
बच्चे पर हर समय “बेस्ट बनने” का दबाव न डालें। उसे अपनी गति से आगे बढ़ने दें। हो सके तो उसे आवश्यक साधन मुहैया कराएं ताकि उसे अपना लक्ष्य हासिल करने में मदद मिल सके। ज़रूरत से ज़्यादा अपेक्षाएं रखने से माता-पिता का मन आहत तो होता ही है, साथ ही बच्चे पर भी इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
6. अपनी तरह बनाने की होड़ न रखें -
माता पिता अपने बच्चों को अपनी तरह बनाने की होड़ से बचें। क्योंकि ज़रूरी नहीं है कि आपके बच्चे का आपकी तरह ही स्वभाव, सोच, रुचि और सपना हो। भले ही वह आपकी तरह दिखता हो लेकिन वह एक अलग पहचान लेकर आगे बढ़ सकता है। वह अपनी एक अलग रुचि, स्वभाव व सोच के चलते एक अलग विधा में अपना नाम रोशन कर सकता है।
निष्कर्ष (Conclusion)
बच्चों की अलग-अलग आदतें आपके तनाव का कारण नहीं, बल्कि सीखने और समझने का अवसर हैं। अगर हम उनकी भिन्नताओं को सम्मान दें, तो वे आत्मविश्वासी और ख़ुशहाल बनेंगे। एक बात हमेशा याद रखिए कि हर बच्चा अपने समय पर खिलने वाला फूल है, बस हमें धैर्य रखकर उसकी ख़ुशबू का इंतज़ार करना चाहिए। तब तक पूरी ईमानदारी से उसकी देखभाल करते रहना चाहिए।
बच्चों का सक्रिय रहना, शरारतें करना, सवाल पूछते रहना, घर में उथल-पुथल मचाना, जैसी आदतों से माता-पिता को अक़्सर थकान या झुंझलाहट महसूस होती है। लेकिन सही मायने में यही उनकी सीखने और बढ़ने की प्रक्रिया है। इसलिए माता पिता को धैर्य रखते हुए उनकी एक्टिविटी को समझने की कोशिश करनी चाहिए। हर शरारत में जिज्ञासा छिपी है। हर ग़लती में सीखने का मौक़ा है। हर सवाल में एक नया दृष्टिकोण है।
याद रखिए आज जो हमें परेशान करते हैं, वही कल हमारे सबसे प्यारे पल बन जाते हैं। सच में, यह एक सच्चाई है कि बच्चे हमारी प्रतिलिपि नहीं होते, बल्कि वे अपनी अलग पहचान लेकर आते हैं। बच्चे माता-पिता से प्रेरणा ले सकते हैं पर उनका सफ़र उनका अपना होता है। उन्हें वही बनने की आज़ादी मिलनी चाहिए जो वो बनना चाहते हैं। न कि वही जो हम चाहते हैं। लेकिन बच्चों को भी यह जानना चाहिए कि माता-पिता की चिंता के पीछे सिर्फ़ उनका भला ही छिपा होता है।
(- By Alok Khobragade)
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