अंतर क्षेत्रीय व्यापार एवं अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में कौन कौन सी समानताएं हैं समझाइए।
अंतर क्षेत्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को लेकर प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री एक मत नहीं हैं। इनके अनुसार अंतरक्षेत्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में असमानताएं पायी जाती हैं। इनके अनुसार अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के लिए एक पृथक सिद्धांत की आवश्यकता है।
किंतु इसके विपरीत आधुनिक अर्थशास्त्री, अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को अंतर क्षेत्रीय व्यापार की एक विशिष्ट दशा मानते हैं। ओहलिन के अनुसार अंतर क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में कोई मौलिक अंतर नहीं होता है। इसलिए अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के लिए किसी पृथक सिद्धांत की कोई आवश्यकता नहीं है। इनके अनुसार दोस्तों ही व्यापार का आधार और उद्देश्य एक ही है। सिर्फ़ श्रेणी में अंतर है। इस अंक में हम अंतर क्षेत्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में क्या समानताएं हैं जानने का प्रयास करेंगे।
अंतर क्षेत्रीय व्यापार तथा अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में समानताएं (Antar kshetriya vyapar tatha antarrashtriya vyapar mein samantayen)
आधुनिक अर्थशास्त्रियों के अनुसार अंतर क्षेत्रीय व्यापार और अंतर्राष्ट्रीय व्यापारों में निम्न समानताएं पायी जाती हैं -
1. वस्तुओं व सेवाओं का विनिमय -
अंतरक्षेत्रीय व अंतर्राष्ट्रीय व्यापार दोनों का मुख्य उद्देश्य एक समान होता है। यानि कि दोनों ही व्यापार का उद्देश्य वस्तुओं व सेवाओं का आदान प्रदान करना होता है। दोनों प्रकार के व्यापारों में विनिमय के द्वारा वस्तुओं तथा सेवाओं को एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में पहुंचाया जाता है। कोई भी देश या क्षेत्र उन्हीं वस्तुओं का उत्पादन करता है जिसमें उसे विशिष्टता प्राप्त होती है। तथा वह देश या क्षेत्र उन वस्तुओं का आयात करता है जिसका उत्पादन अपेक्षाकृत कम होता है।
सरल शब्दों में, अंतर क्षेत्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय दोनों ही प्रकार के व्यापारों में वस्तुओं तथा सेवाओं का विनिमय किया जाता है। दोनों ही क्षेत्र या देश आपसी ज़रुरतों के हिसाब से एक दूसरे के साथ व्यापारिक संबंधों में जुड़ जाते हैं। आज के दौर में मुद्रा के चलन ने इसे और भी सरल एवं सुविधाजनक बना दिया है।
2. विशिष्टीकरण एवं श्रम विभाजन -
अंतर क्षेत्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय दोनों का ही आधार श्रम विभाजन तथा विशिष्टीकरण होता है। इन्हीं क्षेत्रीय विशिष्टताओं के कारण एक देश का अन्य क्षेत्रों या अन्य देशों के साथ व्यापार होता है। उदाहरण के लिए, यदि उत्तर प्रदेश में शक्कर उत्पन्न करने की अनुकूल दशाएं हैं तो वह शक्कर के उत्पादन में विशिष्टता प्राप्त करता है। इसी प्रकार यदि महाराष्ट्र में कपास उत्पन्न करने की अनुकूल दशाएं हैं तो महाराष्ट्र कपास का उत्पादन करता है। ठीक इसी तरह भिन्न-भिन्न देश भी अपनी-अपनी विशिष्टता के आधार पर उत्पादन करते हैं और अन्य देशों के साथ व्यापार करते हैं।
3. संसाधनों का बेहतर उपयोग -
व्यापार चाहे अंतर क्षेत्रीय हो या फ़िर अंतर्राष्ट्रीय हो क्यों न हो। दोनों ही व्यापारियों के अंतर्गत प्राकृतिक संसाधनों, श्रम और पूँजी का श्रेष्ठतम उपयोग किया जाता है। प्रत्येक क्षेत्र या देश अपने उपलब्ध संसाधनों के अनुसार ही किसी वस्तु विशेष का उत्पादन करता है और अतिरिक्त उत्पादन को अन्य क्षेत्रों या देशों की ओर भेजकर अपना व्यापार चलता है। इस तरह वह क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी विशिष्टता के साथ व्यापारिक संबंध बनाने में अपना वर्चस्व स्थापित करता है। इससे उस क्षेत्र या देश को आर्थिक विकास में गति प्राप्त होती है।
4. सांस्कृतिक व सामाजिक संबंध मज़बूत -
व्यापार चाहे अंतर क्षेत्रीय हो या अंतर्राष्ट्रीय, दोनों ही व्यापार में पारस्परिक संबंध में बढ़ोत्तरी होती है। दोनों ही प्रकार के व्यापार में व्यापारियों के मध्य सांस्कृतिक एवं सामाजिक संबंध मज़बूत होते हैं और पारस्परिक सहयोग की भावना में लगातार वृद्धि होती है। दोनों ही व्यापारों में एक-दूसरे के रीति-रिवाजों और परंपराओं का आदान-प्रदान होता है। परिणामस्वरूप व्यापार करने वाले दो देशों के बीच संबंधों का विस्तार होता है जो कि भविष्य में दोनों देशों के लिए लाभदायक होता है।
5. अधिकतम लाभ का उद्देश्य -
अधिकतम लाभ व्यापार आंतरिक हो अथवा अंतर्राष्ट्रीय दोनों का उद्देश्य अधिकतम लाभ कमाना होता है। आंतरिक व्यापार में व्यापारी अपनी वस्तु को उस स्थान पर बेचता है जहां उसकी पूर्ति कम होने के कारण ऊंचे मूल्य मिलते हैं। ठीक उसी प्रकार कमी वाले देशों में माल का निर्यात करके लाभ कमाया जाता है। अधिकतम लाभ की धारणा दोनों ही व्यापारों में पायी जाती है। इसी कारण उत्पादक उन्हीं वस्तुओं का उत्पादन कम से कम लागत पर करते हैं तथा उन्हें अन्य क्षेत्रों या देशों को बेचकर अधिकतम लाभ प्राप्त करते हैं।
6. उपभोक्ताओं को अधिक विकल्प -
अन्तर क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार दोनों ही प्रकार के व्यापार से उपभोक्ताओं को विभिन्न प्रकार की वस्तुएँ और सेवाएँ उपलब्ध होती हैं जिनका उत्पादन उनके क्षेत्र अथवा देश में बहुत कम या असंभव होता है। यदि व्यापार न हो तो लोगों को केवल अपने क्षेत्र या देश में उत्पादित वस्तुओं तक ही सीमित रहना पड़ता है। राष्ट्रीय या अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के माध्यम से दोनों ही क्षेत्रों के उपभोक्ताओं को बेहतर गुणवत्ता और अधिकतम विकल्प मिलते हैं।
7. उत्पादन और आय में वृद्धि -
अंतर क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार दोनों ही अपने अपने क्षेत्र विशेष के उत्पादन को बढ़ावा देते हैं। जब उनके।द्वारा उत्पादित वस्तुओं की माँग दूसरे क्षेत्रों या देशों में बढ़ती है तो उत्पादक अधिक से अधिक उत्पादन करने का प्रयास करते हैं। इससे उन देशों के उद्योगों का विकास होता है, रोज़गार के अवसर बढ़ते हैं और लोगों की आय में वृद्धि होती है।
8. प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा -
दोनों ही प्रकार के व्यापार में प्रतिस्पर्धा का वातावरण बनता है। जब विभिन्न क्षेत्रों या देशों के उत्पाद बाज़ार में आते हैं तो प्रत्येक क्षेत्र या देश के उत्पादकों को अपनी-अपनी वस्तुओं की गुणवत्ता सुधारनी पड़ती है और क़ीमतों को संतुलित रखना पड़ता है। ताकि इससे उपभोक्ताओं को बेहतर क्वॉलिटी की वस्तुएँ उचित मूल्य पर प्राप्त हो सके।
9. बाज़ार का विस्तार -
अंतर क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के कारण विश्व के विभिन्न देशों का व्यापार सीमित क्षेत्रों में न रहकर, समूचे विश्व में बड़े स्तर पर विस्तार पूर्वक होता है। विभिन्न देशों में फैला हुआ बाज़ार अपनी-अपनी वस्तुओं का उत्पादन कर, एक विशिष्टता के आधार पर अलग-अलग क्षेत्रों तक फैलता है। उत्पादकों को केवल अपने क्षेत्र या देश तक सीमित नहीं रहना पड़ता है। बल्कि वे अपने उत्पादों को अन्य क्षेत्रों या देशों में भी व्यापारिक तौर पर बेच सकते हैं। इससे व्यापारिक गतिविधियाँ बढ़ती हैं और आर्थिक प्रगति भी होती है।
10. आर्थिक विकास में योगदान -
अंतर क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार दोनों ही किसी देश की आर्थिक प्रगति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। व्यापार के माध्यम से उत्पादन, निवेश और रोज़गार के अवसर दोनों ही व्यापारिक क्षेत्रों या देशों के बीच बढ़ते हैं। इससे क्षेत्र या देश की आय और समृद्धि में लगातार वृद्धि होती है।
निष्कर्ष (Conclusion)
स्पष्ट तौर पर हमने देखा कि आंतरिक व्यापार और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार दोनों के स्तर भले ही अलग-अलग हैं, किंतु इन दोनों का उद्देश्य, स्वभाव और प्रभाव काफी हद तक एक समान है। दोनों ही व्यापारों में अपनी-अपनी विशिष्ट वस्तुओं का आदान-प्रदान, उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग, विशिष्टता और बाज़ार विस्तार, व्यापारिक संबंधों में प्रगाढ़ता के साथ-साथ आर्थिक विकास को महत्व दिया जाता है।
यही कारण है कि आधुनिक अर्थशास्त्री इन दोनों ही व्यापारों को समान मानते हैं। उन्हें महसूस होता है कि अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के लिए किसी पृथक सिद्धांत की आवश्यकता नहीं है। ओहलिन का मानना है कि प्रदेश हो या राष्ट्र, दोनों ही इन्हीं कारणों से अपने अपने उत्पादन पर विशिष्टता प्राप्त करते हैं और एक-दूसरे से व्यापारिक संबंध बनाते हैं। जिसका सीधा-सीधा लाभ देश और देश के नागरिकों को मिलता है। इसलिए हम कह सकते हैं कि किसी भी देश की अर्थव्यवस्था को मज़बूत बनाना हो तो इसके लिए दोनों ही प्रकार के व्यापार महत्वपूर्ण एवं आवश्यक हैं।
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