दोस्तों मानव जीवन, हर मोड़ पर लिए गए निर्णयों की एक निरंतर श्रृंखला है। फ़िर चाहे शिक्षा का चुनाव हो, कैरियर, विवाह, व्यवसाय या निवेश का मौक़ा हो। या फ़िर मित्रता या आपकी जीवनशैली ही क्यूं न हो। हर मोड़ पर हमें फ़ैसले लेने पड़ते हैं। आपके जीवन में भी ऐसे अनेक मौक़े आते होंगे जहां आप ख़ुद के लिए सही फ़ैसले लेने में पूरी तरह कंफ्यूज़ रहते हैं।
सचमुच कई बार परिस्थितियाँ इतनी कठिन होती हैं, मन भारी दुविधा में फंस जाता है और हम ख़ुद की समस्या के समाधान के लिए पूरी तरह दूसरों की सलाह पर निर्भर हो जाते हैं। लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि आपकी भावनाओं या समस्याओं को कोई दूसरा भला कैसे पूर्ण रूप से समझ सकता है।
दोस्तों यदि आप अपने आस पास नज़र डालेंगे तो निश्चित तौर पर आपको समाज में ऐसे कई उदाहरण मिल जाएंगे जिन्होंने अपने अत्यंत महत्वपूर्ण फ़ैसले दूसरों के कहने पर बदल दिए और अंत में जीवन भर पछतावे की अग्नि में जलते रहे। चाहे फ़िर विवाह हो या कैरियर हो, व्यवसाय हो या निवेश हो।
दोस्तों, सलाह लेना ग़लत नहीं है, लेकिन जब अपने जीवन के अहम फ़ैसले पूरी तरह दूसरों के भरोसे छोड़ दिए जाएं, तो इसके गंभीर और दूरगामी नुक़सान होने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। इस तरह अपनी जिंदगी के अहम फ़ैसले दूसरों के भरोसे लिए जाने की आदत, किसी भी व्यक्ति की सोच, आत्मविश्वास और उसके पूरे जीवन की दिशा को प्रभावित कर सकती है।
अपने जीवन के अहम फ़ैसले दूसरों के भरोसे छोड़ देना अक़्सर आसान लगता है। क्योंकि इससे आपकी ज़िम्मेदारी हल्की हो जाती है। लेकिन आपकी यही आदत भविष्य में कई नुक़सान दे सकती हैं। आइए इसे विस्तार से समझते हैं।
अपने फ़ैसले दूसरों के हाथों में देने के दुष्परिणाम
अपने जीवन के अहम निर्णय दूसरों के भरोसे छोड़ने के नुक़सान बड़े ही भारी होते हैं।
1. आत्मनिर्भरता और आत्मविश्वास की कमी -
जब कोई व्यक्ति बार-बार अपने महत्वपूर्ण निर्णय दूसरों से करवाता है, तो धीरे-धीरे उसका आत्मविश्वास कमज़ोर होने लगता है। उसे लगने लगता है कि वह स्वयं सही निर्णय लेने में सक्षम नहीं है। परिणामस्वरूप वह हर छोटे-बड़े मामले में भी दूसरों पर निर्भर रहने लगता है। मान लीजिए आपको किसी ख़ास क्षेत्र में विशेष रुचि है और आपको उस क्षेत्र में काम करने का अच्छा ख़ासा Experience भी है।
लेकिन आपको ख़ुद पर उतना आत्मविश्वास या भरोसा नहीं है तो निश्चित तौर पर आप अपने कैरियर का फ़ैसला दूसरों पर छोड़ देंगे। और दूसरे आपको वही रास्ता चुनने की सलाह देंगे जिसके बारे में उन्हें पता है। भले ही उस क्षेत्र के बारे में आपको कोई अनुभव न हो। फ़िर आप दूसरों के द्वारा चुने हुए क्षेत्र को बेमन से ढोते चले जाते हैं। यह निर्भरता आपको मानसिक रूप से कमज़ोर बनाने के साथ-साथ, आपकी निर्णय क्षमता को भी पूरी तरह कुंद कर देती है।
2. अपनी पहचान और इच्छाओं का दमन -
हर इंसान की अपनी सोच, रुचियाँ, सपने और लक्ष्य होते हैं। लेकिन जब फ़ैसले दूसरों के भरोसे किए जाते हैं, तो अक़्सर व्यक्ति की अपनी इच्छाएँ पीछे छूट जाती हैं। व्यक्ति बिना किसी रुचि के अपने मन को मारते हुए, दूसरों के हिसाब से काम करता चला जाता है। ऐसा व्यक्ति दूसरों की अपेक्षाओं और सोच के अनुसार जीवन जीने लगता है। धीरे-धीरे उसकी अपनी पहचान धुंधली पड़ जाती है और वह “मैं क्या चाहता हूँ” से ज़्यादा “लोग क्या चाहते हैं” में उलझकर रह जाता है।
जब हम बार-बार दूसरों से फ़ैसले करवाते हैं, तो ख़ुद पर भरोसा कम होने लगता है। धीरे-धीरे हम अपनी समझ, इच्छाओं और क्षमताओं को नज़रअंदाज़ करने लगते हैं। नतीजतन आत्मविश्वास डगमगा जाता है।
3. ग़लत फ़ैसलों का ख़तरा -
इसमें कोई दो मत नहीं कि कोई भी व्यक्ति आपकी परिस्थितियों, भावनाओं और भविष्य की आकांक्षाओं को आपसे बेहतर नहीं समझ सकता। जो सलाह दूसरों को सही लगती है, कोई ज़रूरी नहीं कि आपके लिए वह सलाह बिल्कुल सटीक और उपयुक्त हो। सीधे शब्दों में कहें तो हर सलाह देने वाला व्यक्ति आपके पक्ष में ही हो, यह ज़रूरी नहीं।
कभी-कभी सलाह देने वाले व्यक्ति, अपने हित, डर या कम जानकारी की वजह से आपकी समस्या कम करने के बजाय, उल्टा आपका भारी भरकम नुक़सान कर बैठते हैं। यानि कि जब आप किसी और के भरोसे कोई फ़ैसला ले बैठते हैं तो उसका नुक़सान सीधे आपको ही झेलना पड़ता है, सलाह देने वाले पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।
4. ज़िम्मेदारी से बचने की मानसिकता -
दूसरों पर निर्णय छोड़ने से व्यक्ति में ज़िम्मेदारी से बचने की आदत बन जाती है। यदि परिणाम अच्छा आए तो श्रेय ख़ुद ले लिया जाता है और यदि परिणाम ख़राब हो तो दोष दूसरों पर मढ़ दिया जाता है। इससे न तो व्यक्ति अपनी ग़लतियों से सीख पाता है और न ही मानसिक रूप से परिपक्व बन पाता है।
दरअसल ग़लत फ़ैसलों की ज़िम्मेदारी दूसरों पर टालने की आदत बन जाती है। अगर फ़ैसला ग़लत निकल जाए तो ये कहना आसान हो जाता है कि ये तो किसी और की सलाह थी। ऐसा करने से सीखने की प्रक्रिया रुक जाती है। ख़ुद की ज़िम्मेदारी न लेने से भविष्य में बेहतर निर्णय लेने की क्षमता भी कमज़ोर होती है।
5. पछतावा और असंतोष -
जब जीवन में दूसरों के द्वारा हमारे लिए लिया गया निर्णय ग़लत दिशा में चला जाता है। तब हमें एहसास होता है कि काश ये फ़ैसला ख़ुद ही लिया होता। काश हमने अपने मन की सुनी होती। तब व्यक्ति के मन में गहरा पछतावा जन्म लेता है। यह पछतावा धीरे-धीरे असंतोष, तनाव और मानसिक पीड़ा का कारण बन जाता है।
सीधे तौर पर बात करें तो अपने निजी फ़ैसले दूसरों के हाथों में दे देने से हमारा नियंत्रण अपने ही जीवन से खो जाता है। इससे असंतोष, पछतावा एक ख़ास शब्द "काश" हमेशा के लिए दिमाग़ में बैठ जाता है।
6. रिश्तों में तनाव और कड़वाहट -
दूसरों की सलाह पर लिए गए फ़ैसले अगर सही साबित न हों, तो नाराज़गी, शिकायत और दोषारोपण का दौर शुरू हो जाता है। आपसी रिश्तों में कड़वाहट आने लगती है। व्यक्ति सलाह देने वाले को दोषी ठहराने लगता है, जिससे विश्वास और प्रेम में कमी आती है। कई बार परिवार और मित्रों के बीच आपसी मतभेद इसी कारण पैदा होते हैं। ज़रा सोचिए ज़िंदगी आपकी, मगर फ़ैसला दूसरों का, फ़िर आपका जीवन प्रभावित हुए बिना कैसे रह सकता है।
7. निर्णय लेने की क्षमता कमज़ोर पड़ती है -
जीवन में ख़ास मौक़ों पर निर्णय लेना एक कौशल है, जो अनुभव और अभ्यास से विकसित होता है। यदि आप स्वयं फ़ैसले लेना छोड़ देंगे, तो निश्चित रूप से आपकी निर्णय लेने की क्षमता कभी विकसित नहीं होगी। भविष्य में जब भी आपके सामने कोई कठिन परिस्थिति आएगी, तब आप निर्णय लेने में ख़ुद को पूरी तरह असहाय महसूस करेंगे। इसलिए अपने जीवन में आने वाली कठिनाइयों में ख़ुद ही निर्णय लेने का प्रयास करना चाहिए। आगर अभ्यास ही नहीं करेंगे, तो कठिन हालातों में ख़ुद निर्णय लेने की हिम्मत और समझ दोनों ही कम पड़ जाएंगी।
8. स्वार्थपूर्ण सलाह का ख़तरा
एक अत्यंत महत्वपूर्ण एवं कड़वा सच यह है कि आपकी समस्या, आपसे बेहतर कोई नहीं समझ सकता है। दूसरे आपकी निजी समस्याओं को केवल अपनी नज़र व समझ के अनुरूप ही देख पाते हैं। वे अपने सुविधा, अनुभव, सोच, स्वार्थ या सीमाओं के अनुसार ही निर्णय या सलाह दे पाते हैं।
हमेशा याद रखें कि हर सलाह निष्पक्ष नहीं हो सकती।
जो फ़ैसला दूसरों के लिए सही है, कोई ज़रूरी नहीं कि वही फ़ैसला आपके लिए भी सही हो। आपके अपने सपने, डर और हालातों को कोई दूसरा कभी भी उतनी गहराई से नहीं समझ सकता जितना आप ख़ुद।आप अगर दूसरों पर आँख मूंदकर भरोसा करते हैं, तो आप शोषण या किसी ग़लत दिशा के शिकार भी हो सकते हैं। इतिहास और समाज ऐसे अनेक उदाहरणों से भरा पड़ा है।
9. जीवन पर नियंत्रण खोने का एहसास
जब जीवन के फ़ैसले दूसरों के हाथ में दे दिए जाते हैं तब व्यक्ति को लगने लगता है कि उसका जीवन अब उसके नियंत्रण में नहीं रह गया है। यही भावना उसे कमज़ोर असहाय और भ्रमित कर देती है। जीवन में असली संतुष्टि तभी आती है जब व्यक्ति अपने फ़ैसलों का स्वामी स्वयं होता है।
10. मानसिक तनाव और भ्रम -
दूसरों से मिलने वाली अलग-अलग राय व्यक्ति को अक़्सर भ्रमित कर देती है। अलग-अलग व्यक्ति से अलग-अलग राय मिलने के कारण, व्यक्ति निर्णय ही नहीं ले पाता है। उसकी यह स्थिति मानसिक तनाव, चिंता और अस्थिरता को जन्म देती है। जिस कारण वह व्यक्ति ज़िंदगी भर दूसरे के भरोसे पर जीता है।
निष्कर्ष (Conclusion)
अपने जीवन के अहम फ़ैसले दूसरों के भरोसे छोड़ देना आसान ज़रूर लगता है, लेकिन इसके नुक़सान गहरे और स्थायी होते हैं। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि किसी से सलाह लेना ग़लत है। दूसरों से सलाह ज़रूर लें, लेकिन अंतिम निर्णय ख़ुद ही लेना सीखें। क्योंकि अपने मूल्यों, क्षमताओं और लक्ष्यों को आप ही पूरी तरह प्राथमिकता दे सकते हैं। कोई दूसरा नहीं।
जीवन हमारा है, उसकी राह भी हमें ही चुननी चाहिए। सही निर्णय वही होता है, जिसकी ज़िम्मेदारी हम पूरे साहस के साथ उठा सकें। दूसरों की सलाह रोशनी की तरह हो सकती है, लेकिन रास्ता आपको ख़ुद चलना होता है। जीवन आपका है। उसके अहम फ़ैसलों की कमान भी आपके ही हाथ में होनी चाहिए।
जीवन में फ़ैसला लेने के बाद परिणाम जो भी हो, ख़ुद की ज़िम्मेदारी स्वीकार करें। ग़लतियों से सीखने का साहस रखें। सलाह सभी से लें, लेकिन अंत में फ़ैसला खुद के विवेक से करें। भविष्य में कम से कम कोई पछतावा नहीं रहेगा कि काश हमने फलां निर्णय ख़ुद लिया होता तो आज ये परिणाम न हुआ होता।
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